पटना हाई कोर्ट ने मंदिर विकास परियोजना की टेंडर रद्दीकरण प्रक्रिया को सही ठहराया

पटना हाई कोर्ट ने मंदिर विकास परियोजना की टेंडर रद्दीकरण प्रक्रिया को सही ठहराया

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना हाई कोर्ट ने एक ठेकेदार फर्म द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम (BSTDC) द्वारा बाबा गणिनाथ मंदिर, वैशाली के विकास के लिए जारी टेंडर को रद्द करने को चुनौती दी गई थी। यह ठेका लगभग ₹7.62 करोड़ का था।

याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने 31 जुलाई 2019 को जारी टेंडर के जवाब में आवेदन किया था और तकनीकी और वित्तीय दोनों चरणों में सफल पाया गया था। केवल उसी की बोली मान्य मानी गई थी, और उसकी वित्तीय बोली सबसे कम (L1) थी। याचिकाकर्ता ने बोली की वैधता अवधि को आगे बढ़ाने का भी प्रस्ताव दिया था क्योंकि वह 30 जनवरी 2020 को समाप्त हो रही थी। लेकिन विभाग ने कभी इस बढ़ोतरी को औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं दी।

बाद में, BSTDC ने 7 जुलाई 2020 को टेंडर रद्द कर दिया और नई दरों (SOR) के आधार पर दोबारा टेंडर निकालने का निर्णय लिया। यह निर्णय वित्त विभाग के 2016 के एक आदेश के आधार पर लिया गया था, जिसमें कहा गया था कि यदि केवल एक ही बोली प्राप्त होती है तो पुनः-निविदा आवश्यक है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि:

  • एक बार जब वित्तीय बोली खोली गई, तो प्रक्रिया की गोपनीयता भंग हो गई।
  • टेंडर रद्द करने का कोई ठोस कारण नहीं दिया गया।
  • नई दरों पर फिर से टेंडर निकालने से लागत बढ़ेगी, जिससे उसे और सरकार को आर्थिक नुकसान होगा।

वहीं राज्य और BSTDC ने जवाब दिया कि:

  • टेंडर रद्द करना सरकारी नीति पर आधारित था।
  • नए SOR के अनुसार नई लागत जरूरी है ताकि गुणवत्ता बनी रहे।
  • बोली की वैधता अवधि समाप्त हो चुकी थी।
  • नई निविदा में भाग लेने के लिए याचिकाकर्ता को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि पुराने दरों पर उसकी बोली अब अप्रासंगिक हो चुकी है।

कोर्ट ने सभी तथ्यों और पुराने निर्णयों की समीक्षा करने के बाद माना कि राज्य सरकार और BSTDC का फैसला नीति और जनहित पर आधारित था। जब नई निविदा पूरी तरह से नए SOR के आधार पर होगी, तो याचिकाकर्ता की पहले दी गई बोली सार्वजनिक हो जाने से उसे कोई नुकसान नहीं होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी ठेकों से संबंधित मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ हैं। जब तक कोई निर्णय अनुचित, पक्षपातपूर्ण या मनमाना न हो, कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

यह निर्णय दर्शाता है कि सरकारी टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है। केवल एक बोली आने पर टेंडर रद्द कर पुनः निविदा निकालना सरकार की नीति है, जिससे काम की गुणवत्ता और लागत नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।

सरकार के लिए यह निर्णय इस बात की पुष्टि करता है कि वह सार्वजनिक धन की रक्षा करते हुए उचित प्रक्रिया का पालन कर सकती है। ठेकेदारों के लिए यह एक संकेत है कि बोली में सफल होना कार्यादेश पाने की गारंटी नहीं है, खासकर जब सरकारी नीति या जनहित कुछ और कहे।

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि कोर्ट केवल तभी हस्तक्षेप करेगा जब कोई निर्णय साफ तौर पर अनुचित हो या पारदर्शिता की कमी हो।

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या एकल वित्तीय बोली खुलने के बाद टेंडर रद्द करना गलत था?
    • उत्तर: नहीं। 2016 की सरकारी नीति के अनुसार एकल बोली पर पुनः टेंडर आवश्यक था।
  • क्या याचिकाकर्ता की वित्तीय बोली सार्वजनिक हो जाने से उसे हानि हुई?
    • उत्तर: नहीं। क्योंकि नई टेंडर प्रक्रिया नई दरों पर आधारित होगी, पुरानी बोली अब अप्रासंगिक हो गई है।
  • क्या अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए था?
    • उत्तर: नहीं। निर्णय नीति और जनहित पर आधारित था, अतः कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • M/s Parmar Enterprises बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, CWJC No. 8025 of 2016
  • M/s Technofab Engineering Ltd. बनाम बिहार राज्य पॉवर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड, CWJC No. 6293 of 2013

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Tata Cellular बनाम भारत सरकार, (1994) 6 SCC 651
  • Raunaq International Ltd. बनाम I.V.R. Construction Ltd., (1999) 1 SCC 492
  • Jagdish Mandal बनाम उड़ीसा राज्य, (2007) 14 SCC 517
  • Siemens Aktiengeselischaft & Siemens Ltd. बनाम DMRC Ltd., (2014) 11 SCC 288

मामले का शीर्षक

M/s B. N. Enterprises बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

CWJC No. 7054 of 2020

उद्धरण (Citation)

2021(1)PLJR 135

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • श्री प्रभात रंजन, अधिवक्ता (याचिकाकर्ता की ओर से)
  • श्री अजीत कुमार, GA-9 (राज्य सरकार की ओर से)
  • श्री अभिमन्यु, अधिवक्ता (निगम की ओर से)

निर्णय का लिंक

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNzA1NCMyMDIwIzEjTg==-QMDi0Ml9nrE=

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Aditya Kumar

Aditya Kumar is a dedicated and detail-oriented legal intern with a strong academic foundation in law and a growing interest in legal research and writing. He is currently pursuing his legal education with a focus on litigation, policy, and public law. Aditya has interned with reputed law offices and assisted in drafting legal documents, conducting research, and understanding court procedures, particularly in the High Court of Patna. Known for his clarity of thought and commitment to learning, Aditya contributes to Samvida Law Associates by simplifying complex legal topics for public understanding through well-researched blog posts.

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